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| Bhagavan
Rishabha तीर्थकर ऋषभदेव |
आदिमं
पृथिवीनाथमादिमं
निष्प्ररिग्रहम्।
आदिमं तीर्थनाथं च
ऋषभस्वामिनं स्तुम:।।3।।
जो इस अवसर्पिणी कालमें
पहला ही राजा, पहला ही
त्यागी मुनि और पहला ही
तीर्थंकर हुआ है, उस
ऋषभदेव स्वामी की हम
स्तुति करते है।
- श्री हेमचन्द्रचार्य |
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जैन परम्परा के चौबीस
तीर्थकरोंमें ऋषभदेव ही ऐसे
तीर्थकर हैं, जिसे संसार
का प्राचीनतम ग्रन्थ
ऋग्वेद इन शब्दों में वर्णन करता
है- त्रिधा बद्धोवृषभोरोरवीतिमहादेवोमत्यांआ
विवेश॥ इस मन्त्रांश का
शब्दार्थ है - तीन स्थानों से बंधे हुये वृषभ
ने बारंबार घोषणा की कि
महादेव मनुष्यों में ही प्रविष्ट
हैं। यह घोषणा आत्मा को ही
परमात्मा बनाने की घोषणा
है। आत्मा में परमात्मा के
दर्शन करने के लिए मन, वचन,
काय का संयम आवश्यक है। यह
त्रिगुप्तिही वृषभ का तीन स्थानों
पर संयमित होना है।
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जैन तीर्थकर ऋषभदेव को
अपना प्रवर्तक तथा प्रथम
तीर्थकर मानकर पूजा करते
ही हैं, किंतु भागवत् भी
घोषणा करता है कि नाभि का
प्रिय करने के लिए विष्णु
ने मरूदेवी के गर्भ से वातरशना ब्रह्मचारी ऋषियों को धर्म का उपदेश
देने के लिए ऋषभदेव के
रूप में जन्म लिया- नाभे: प्रियचिकीर्षया। तदवरोधायने
मेरूदेव्यां धर्मान्दर्शयितुकामो
वातरशनानां श्रमणानामृषिणां ऊर्ध्वमन्थिनां
शुक्लया तनुवावततारा
(श्रीमद्भागवत 5/3/20)
भागवत् के पांचवें स्कंध
के पांचवें अध्याय में उस
उपदेश
का विस्तार से वर्णन है
जिसे ऋषभदेव ने दिया था।
तीर्थकर ऋषभदेव का
जन्म चैत्रशुक्ला नवमी को
अयोध्या में हुआ था तथा
माघ कृष्णा चतुर्दशी को इनका निर्वाण
कैलाशपर्वत से हुआ था। आचार्य जिनसेन के
आदिपुराण में
तीर्थकर ऋषभदेव के जीवन चरित
का विस्तार से वर्णन है।
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प्रजापतिर्यः
प्रथमं जिजीविषुः शशास
कृष्यादिसु कर्मसु प्रजाः भगवान् ऋषभदेव ने असि, मसि,
कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कर्मो के
द्वारा उन्होंने जहां समाज को विकास का मार्ग
सुझाया वहां अहिंसा, सत्य, संयम, समता, साधना और
तप के उपदेश द्वारा समाज की आंतरिक चेतना को भी
जगाया। |
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तीर्थकर ऋषभदेव का निर्वाण
माघ कृष्णा चतुर्दशी को कैलाशपर्वत से हुआ था।

कैलाशपर्वत |
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