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पूजाएँ दो प्रकार से की जा सकती हैं | 'द्रव्यपूजा'
द्रव्याष्टक बोलते हुए क्रमशः द्रव्य चढ़ाते हुए
करते हैं | जबकि 'भावपूजा' आरम्भ-परिग्रह त्यागने
वाले श्रावक, मुनिगण तथा बिना सामग्री के पूजन करने के
इच्छुक मन के भावों से 'भावाष्टक' बोलकर करते हैं |
सिद्धों की पूजा के दोनों ही प्रकार के ;
अष्टक संस्कृत में भी है तथा हिन्दी भाषा में
भी | हिन्दी भावाष्टक युक्त एक संपूर्ण पूजा अलग से भी हैं
| पूजक अपनी भावना के अनुसार कोई भी पूजन कर सकते हैं |
सिद्ध पूजा (संस्कृत
द्रव्याष्टक)
ऊर्ध्वाधो रयुतं सविन्दु सपरं
ब्रह्म-स्वरावेष्टितं,
वर्गापूरित-दिग्गताम्बुज-दलं
तत्संधि-तत्वान्वितं |
अंतः पत्र-तटेष्वनाहत-युतं
ह्रींकार-संवेष्टितं |
देवं ध्यायति यः स
मुक्तिसुभगो वैरीभ-कण्ठी-रवः ||
अर्थ- ऊपर और
नीचे रेफ से युक्त बिन्दु सहित हकार
है (र्हं), जिसे घेरती हुई वर्गपूरित आठ
पंखुड़िया (अर्थात् पहली पंखुड़ी पर अ आ इ ई उ ऊ
ए ऐ ओ अं अः ऋ ऋ लृ लृ; दूसरी पंखुड़ी पर क ख ग घ ड़;
तीसरी पंखुड़ी पर च छ ज झ ञ; चौथी पंखुड़ी
पर ट ठ ड ढ ण;
पांचवी पंखुड़ी पर त थ द ध न;
छठवीं पंखुड़ी पर प फ ब भ म;
सातवीं पंखुड़ी पर य र ल व; आठवीं पंखुड़ी पर श ष स ह
है) | आठों पंखुड़ियों के जुड़ावों पर 'णमो अरिहंताणं' है,
पंखड़ियों के भीतरी
किनारे 'ह्रीं' से सहित हैं, ऐसे अक्षरात्मक सिद्ध
परमेष्ठी का जो ध्यान करता है वह
मुक्ति रुपी सुन्दरी का पति तथा कर्म रुपी हाथी को
सिंह के समान नष्ट करने वाला होता है |
ॐ ह्रीं श्री
सिद्धचक्राधिपते !
सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र
अवतर अवतर संवौषट् |
ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपते !
सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र
तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |
ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपते !
सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र मम
सन्निहितो भव भव वषट् |
निरस्तकर्म-सम्बन्धं
सूक्ष्मं नित्यं निरामयम् |
वन्देऽहं
परमात्मानममूर्त्तमनुपद्रवम् ||
(सिद्धयन्त्र
की स्थापना कर वन्दन करें | )
अर्थ- कर्म बंधन
से रहित अशरीरी होने के कारण 'सूक्ष्म', जन्म
मरणादि रहित होने से 'नित्य', शारीरिक तथा
मानसिक आधि व्याधियों से
रहित होने के कारण 'निरामय-निरोग',
पुद्गल का संबंध न होने के कारण 'अमूर्त', तथा
सांसारिक संबंध न होने से 'उपद्रव रहित'
सिद्ध परमात्मा को नमस्कार करता हूँ |
सिद्धौ
निवासमनुगं परमात्म-गम्यं,
हान्यादिभावरहितं भव-वीत-कायम् |
रेवापगा-वर-सरो-यमुनोद्भवानां,
नीरैर्यजे कलशगैर्-वरसिद्ध-चक्रम् ||
अर्थ- लोक के
अंत भाग में विराजमान, केवल
सर्वज्ञ ; देव परमात्मा के जानने योग्य, हानी-वृद्धि, (जन्म-मरण)
आदि विकारों से सहित संसारातीत शरीर वाले
सिद्धों के समूह को रेवा, गंगा, यमुना आदि
स्वच्छ सरिताओं के जल भरे
कलशों के जल से पूजता हुँ |
ॐ ह्रीं
सिद्धचकाधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने
जन्मजरामृत्यु विनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा |1|
आनन्द-कन्द-जनकं घन-कर्म-मुक्तं,
सम्यक्त्व-शर्म-गरिमं
जननार्तिवीतम् |
सौरभ्य-वासित-भुवं हरि-चन्दनानां,
गन्धैर्यजे परिमलैर्वर-सिद्ध-चक्रम् ||
अर्थ- आनंद
के अंकुर ; को उत्पन्न करने वाले, कर्म मल से
रहित, क्षायिक सम्यक्त्व तथा अनंत सुखधारी होने से परम
गौरवशाली, जन्म की पीड़ा से रहित, निर्मल
कीर्ति रुपी सुरभि के वास ऐसे सिद्ध समूह को
मलय गिरि के मनोहर सुंगधित
चन्दन से पूजन करता हूँ |
ॐ ह्रीं
श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने संसार
ताप विनाशनाय चन्दनं
निर्वपामीति स्वाहा |2|
सर्वावगाहन-गुणं सुसमाधि-निष्ठं,
सिद्धं स्वरुप-निपुणं
कमलं विशालम् |
सौगन्ध्य-शालि-वनशालि - वराक्षतानां,
पुंजैर्यजे - शशिनिभैर्वरसिद्धचक्रम् ||
अर्थ-
आयु कर्म के नाश से प्रकट अवगाहन गुण के धारक,
अपने अनंत गुणों में मग्न, अपने
निष्कलंक स्वरुप और ; परम ज्ञान
से सम्पूर्ण जगत में प्रसिद्ध सिद्ध भगवान
को सुगंधित श्रेष्ठ चन्द्रमा के समान
निर्मल अक्षतों के पुंज से
पूजन करता हूँ |
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा |3|
नित्यं स्वदेह- परिमाणमनादिसंज्ञं,
द्रव्यानपेक्षममृतं
मरणाद्यतीतम् |
मन्दार - कुन्द - कमलादि -
वनस्पतीनां,
पुष्पैर्यजे शुभतमै -
र्वरसिद्धचक्रम् ||
अर्थ-
कर्मों के द्वारा होने वाली जन्म मरणादि अनेक
अनित्य पर्यायों से रहित
होने के कारण नित्य, चरमशरीर
से कुछ कम अपने शरीर के
परिणाम में अवस्थित, अनादि कालीन पुद्गलादिक अन्य द्रव्यों
से निरपेक्ष अपनी सिद्ध पर्याय से अच्युत और जीवों
को ध्यान करने पर अमृत के समान सुख करने
वाले मरण शोक रोगादिक से
रहित सिद्ध समूह की मंदार कुंद कमल वृक्षों के
अत्यन्त पुष्पों से पूजन करता हूँ |
ॐ ह्रीं
श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने कामबाण
विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा |4|
ऊर्ध्व-स्वभाव-गमनं सुमनो-व्यपेतं,
ब्रह्मादि-बीज-सहितं गगनावभासम् |
क्षीरान्न-साज्य-वटकै रसपूर्णगर्भै -
र्नित्यं यजे चरुवरैर्वसिद्धचक्रम् ||
अर्थ-
कर्म बंध टूट जाने के कारण स्वभाव से ही ऊर्ध्वगमन करने
वाले, जो इन्द्रिय एवं मतिज्ञानावरण के क्षयोपशम से होने
वाले, द्रव्य मन- भाव मन से रहित, तथा अमूर्तक हैं, निर्मल हैं,
आकाश के समान जिनका ज्ञान
व्यापक है, उन परमपूज्य सिद्ध को दूध, अन्न-घृतादि से बने रस
पूर्ण व्यंजनो से सर्वदा पूजन करता हूँ |
ॐ ह्रीं
श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोगविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा |5|
आंतक-शोक-भयरोग-मद प्रशान्तं,
निर्द्वन्द्व-भाव-धरणं महिमा-निवेशम् |
कर्पूर-वर्ति-बहुभिः कनकावदातै -
र्दीपैर्यजे रुचिवरैर्वरसिद्धचक्रम् ||
अर्थ-
संताप अथवा उदासी, शोक,
भय, रोग, मान से रहित,
निर्द्वन्द्वता के धारक (दुविधा
से रहित),
निश्चल तथा सर्वोत्तम
महिमा (बड़प्पन) के घर
स्वरुप सिद्ध समूह की मैं
स्वर्ण पात्रों में सजी
कपूर की अनेक बत्तियों
युक्त दीपकों द्वारा
अर्चना करता हूँ |
ॐ ह्रीं
श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने
मोहान्धकारविनाशनाय दीपं
निर्वपामीति स्वाहा |6|
पश्यन्समस्त - भुवनं
युगपन्नितान्तं,
त्रैकाल्य-वस्तु-विषये
निविड़ - प्रदीपम् |
सद्द्रव्यगन्ध - घनसार -
विमिश्रितानां,
धूपैर्यजे परिमलैर्वर -
सिद्धचक्रम ||
अर्थ- केवल
ज्ञान द्वारा समस्त संसार
को अच्छी तरह
एक साथ देखने वाले तथा भूत-
भविष्यत तथा वर्तमान कालवर्ती
पदार्थों को तथा उनकी
पर्यायों को प्रकाशित
करने में दैदीप्यमान दीपक के समान
सर्वोत्तम सिद्ध समूह को
मैं कपूर, चंदन, अगर आदि
उत्तम तथा सुगंधित पदार्थों की
सुंगधित धूप द्वारा पूजा करता हूँ |
ॐ ह्रीं
श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मदहनाय धूपं
निर्वपामीति स्वाहा |7|
सिद्धासुरादिपति - यक्ष - नरेन्द्रचक्रै -
र्ध्येयं शिवं सकल - भव्य - जनैः सुवन्द्यम् |
नारड़ि्ग - पूग - कदली -
फलनारिकेलैः,
सोऽहं यजे
वरफलैर्वरसिद्धचक्रम् ||
अर्थ-
व्यन्तर-असुर कुमार आदि
देवों के इन्द्रों के तथा
यक्ष-नरपतियों के समूहों
द्वारा ध्येय, कल्याण स्वरूप, समस्त भव्य
पुरुषों द्वारा वन्दनीय सिद्धों
के संघ की नारंगी, सुपारी,
केला तथा नारियल आदि उत्तम फलों
के द्वारा पूजन करता हूँ |
ॐ ह्रीं
श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने
मोक्षफलप्राप्तये फलं
निर्वपामीति स्वाहा |8|
गन्धाढ्यं सुपयो
मधुव्रत-गणैः संगं वरं
चन्दनं,
पुष्पौघं विमलं सदक्षत-चयं
रम्यं चरुं दीपकम् |
धूपं गन्धयुतं ददामि
विविधं श्रेष्ठं फलं
लब्धये,
सिद्धानां युगपत्क्रमाय
विमलं सेनोत्तरं
वाञ्छितम् ||
अर्थ-
सुगंधित निर्मल जल, जिसकी
सुगंध से भौरे आ गये हैं
ऐसा चंदन, उज्जवल अक्षत,
पुष्प-पुंज, मनोहर नैवेद्य,
दीपक तथा सुगंधित धूप, एवं
उत्तम फलों को एक साथ
मिलाकर अर्घ्य बनाकर, जन्म
मरण राग द्वेषादि
दोषों से रहित निर्मल, कर्म
बंधनादि रहित, अथवा चक्रवती इन्द्रादि
पद से भी उत्तम अभीष्टफल पाने के लिए
सिद्धों के चरणों में
समर्पित करता हूँ |
ॐ ह्रीं
श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने
अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |9|
ज्ञानो पयो गविमलं विशदात्मरुपं,
सूक्ष्म-स्वभाव-परमं यदनन्तवीर्यम् |
कर्मौघ-कक्ष-दहनं सुख-शस्यबीजं,
वन्दे सदा निरुपमं वर-सिद्धचक्रम् ||
अर्थ- कषायों
के क्षय हो जाने से जिनका ज्ञानोपयोग
निर्मल है, समस्त कर्ममल के
नष्ट हो जाने से जिनका आत्म स्वरुप परम
निर्मल है, जो औदारिक कर्माणादि शरीरों
से रहित होने के कारण परम सूक्ष्म
हैं, वीर्य घातक अंतराय कर्म
के नाश हो जाने से अनंतबल के धारक हैं, कर्म
समूह को जलाने वाले तथा सुखरुप धान्य को उत्पन्न
करने में बीज के समान हैं, ऐसे अनुपम गुणधारी सिद्धों
के समूह को मैं सर्वदा नमस्कार करता हूं |
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने पूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा |
त्रैलोक्येश्वर-वन्दनीय-चरणाः
प्रापुः श्रियं शाश्वतीं,
यानाराध्य निरुद्ध-चण्ड-मनसः
सन्तोऽपि तीर्थंकरा |
सत्सम्यक्त्व-विबोध-वीर्य्य-विशदाऽव्याबाधताद्यैर्गुणै-
र्युक्तांस्तानिह तोष्टवीमि सततं सिद्धान्
विशुद्धोदयान् ||
अर्थ-
देवेन्द्र धरणेन्द्र चक्रवर्ती आदि से जिनके
चरण पूजनीय हैं ऐसे तीर्थंकर भी जिनकी
आराधना करके नित्य लक्ष्मी
को पा चुके हैं तथा जो क्षायिक सम्यक्त्व,
अंनत ज्ञान, अंनत ; वीर्य, अव्याबाध आदि अंनत
गुणों से विभूषित हैं और
जिनमें परम विशुद्धता का
उदय हो गया है ऐसे सिद्धों
का मैं सर्वदा बारंबार
स्तवन करता हूं | 11|
जयमाला
विराग सनातन शांत
निरंश, निरामय निर्भय निर्मल हंस |
सुधाम विबोध-निधान विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ- राग
रहित हे वीतराग, हे सनातन (अनादि-अनिधन);
उद्वेग, द्वेष, क्रोधादि रहित होने से
वास्तविक शांति को प्राप्त करने वाले हे
शान्त, अंश कल्पना से रहित
होने के कारण हे निरंश, शारीरिक
मानसिक रोगों से रहित हे निरामय, मरणादि
भयों से रहित होने के कारण हे निर्भय, हे
निर्मल आत्मा, निर्मल
ज्ञान के ऊत्तमधाम, मोहरहित होने से विमोह
ऐसे परम सिद्धों के समूह (हम
पर) प्रसन्न होइये |1|
विदुरित-संसृति-भाव
निरंग, समामृत-पूरित देव
विसंग |
अबंध कषाय-विहीन विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ||
अर्थ- हे
सांसारिक भावों
को दूर करने वाले, हे अशरीर,
हे समता रूपी अमृत से परिपूर्ण
देव, हे अंतरंग
बहिरंग संगरहित
विसंग, हे कर्म
बंधन से विनिर्मुक्त, हे
कषाय रहित, हे विमोह, विशुद्ध सिद्धों के
समूह (हम पर) प्रसन्न होइये
|2|
निवारित-दुष्कृतकर्म-विपाश,
सदामल-केवल-केलि-निवास |
भवोदधि-पारग शांत विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ||
अर्थ- हे
दुष्कर्म के नाशक, हे कर्म
जंजाल से रहित, हे निर्मल
केवल ज्ञान के क्रीड़ा
स्थल, संसार के पारगामी,
हे परम शान्त, हे मोहमुक्त
पवित्र सिद्धों के समूह (हम
पर) प्रसन्न होइये |3|
अनंत-सुखामृत-सागर-धीर,
कंलक-रजो-मल-भूरि-समीर |
विखण्डित-काम विराम-विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध
समूह ||
अर्थ- हे
अनंत सुख रुपी
अमृत के समुद्र, हे धीर कंलक रुपी धूलि
को उड़ाने के लिए
प्रबल वायु, हे
काम विकार को
खंडित करने वाले, हे कर्मों
के विराम स्थल, हे निर्मोह
पवित्र सिद्धों के समूह (हम
पर) प्रसन्न होइये |4|
विकार विवर्जित तर्जितशोक,
विबोध-सुनेत्र-विलोकित-लोक |
विहार विराव विरंग विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ||
अर्थ- कर्म
जन्य शुभ अशुभ विकारों से
रहित, हे शोक रहित, हे केवल
ज्ञान रुपी नेत्र से
सम्पूर्ण लोक
को देखने
वाले, कर्मादिक द्वारा हरण
से रहित, शब्द रहित तथा रंग
से रहित ऐसे हे मोह रहित परम
विशुद्ध सिद्धों के समूह (हम
पर) प्रसन्न होइये |5|
रजोमल-खेद-विमुक्त
विगात्र, निरंतर नित्य
सुखामृत-पात्र |
सुदर्शन राजित नाथ विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ||
अर्थ- दोष
आवरण तथा खेदरहित, हे
अशरीर, हे निरंतर, समय के
अन्तररहित, सुख रुपी अमृत के पात्र, हे सम्यक
दर्शन या केवल दर्शन
से शोभायमान हे संसार
के स्वामी, हे मोह रहित परम पवित्रता
युक्त सिद्धों के समूह (हम
पर) प्रसन्न होइये |6|
नरामर-वंदित
निर्मल-भाव, अनंत मुनीश्वर
पूज्य विहाव |
सदोदय विश्व महेश विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ||
अर्थ- हे
मनुष्य और देवों से पूजनीय, हे समस्त
दोषों से मुक्त होने के कारण निर्मल भाव वाले, हे अनंत
मुनीश्वरों से पूज्य, हे विकार रहित, हे सर्वदा उदय
स्वरुप, हे समस्त संसार के महा स्वामिन्, हे
विमोह, हे परम पवित्र सिद्धों
के समूह (हम पर) प्रसन्नता धारण कीजिए |7|
विदंभ वितृष्ण
विदोष विनिद्र, परापरशंकर सार वितंद्र |
विकोप विरुप विशंक विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ||
अर्थ- हे
घमण्ड रहित, हे तृष्णा रहित,
द्वेषादिक दोष रहित, हे
निद्रा रहित, हे स्व तथा पर
की महा अशान्ति के ; कारक
अधर्म का नाश कर धर्म रुपी शान्ती को करने
वाले, हे आलस्य रहित, हे कोप रहित, हे
रूप रहित हे शंका रहित, हे मोह रहित विशुद्ध सिद्धों
के समूह (हम पर) प्रसन्न होइये |8|
जरा-मरणोज्झित-वीत-विहार,
विचिंतित निर्मल निरहंकार |
अचिन्त्य-चरित्र विदर्प विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ||
अर्थ- हे
वृद्धावस्था तथा मरणदशा को पार करने
वाले, हे गमन रहित, चिन्तारहित, हे अज्ञानादिक आत्मीय मैल से
हे अंहकार रहित, अचिंत्य चारित्र के धारक, हे दर्प
रहित, हे मोह रहित, परम पवित्र सिद्धों के संघ (हम पर)
प्रसन्नता धारण कीजिए |9|
विवर्ण विगंध
विमान विलोभ, विमाय विकाय विशब्द विशोभ |
अनाकुल केवल सर्व विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध समूह ||
अर्थ- हे
श्वेत पीतादिक वर्ण रहित,
हे गंध रहित, हे छोटे बड़े
हल्के भारी आदि परिमान से
रहित, हे लोभ रहित, हे लोभ
रहित, हे माया रहित, हे शरीर
रहित, हे शब्द रहित, हे कृत्रिम शोभा रहित, हे आकुलता रहित,
सबका हित करने वाले, मोह रहित परम पवित्र
सिद्धों के समूह (हम पर) प्रसन्नता
धारण कीजिए |10|
घत्ता
असम-समयसारं चारु-चैतन्य चिह्नं,
पर-परणति-मुक्तं पद्मनंदीन्द्र-वन्द्यम् |
निखिल-गुण-निकेतं सिद्धचक्रं विशुद्धं,
स्मरति नमति यो वा स्तौति
सोऽभ्येति मुक्तिम् ||
अर्थ- इस
प्रकार जो मनुष्य असम (असाधारण)
अर्थात् संसारी आत्माओं से भिन्न, समय
सार स्वरुप, सुन्दर निर्मल चेतना जिनका चिन्ह
है, जड़ द्रव्य के परिणमन से रहित
तथा पद्मनंदी देव मुनी द्वारा वन्दनीय एवं समस्त गुणों
के घर रुप सिद्धमण्डल को जो स्मरण करता
है नमस्कार करता है ; तथा उनका स्तवन करता है वह मोक्ष को पा लेता है |
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये
सिद्धपरमेष्ठिने पूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा |
अडिल्ल छंद
अविनाशी अविकार परम-रस-धाम हो,
समाधान सर्वज्ञ सहज अभिराम हो |
शुद्धबुद्ध अविरुद्ध अनादि अनंत हो,
जगत-शिरोमणि सिद्ध सदा जयवंत हो ||
अर्थ-
हे भगवान आप अविनाशी,
अविकार, अनुपम सुख के स्थान,
मोक्ष स्थान में रहने वाले, सर्वज्ञ तथा स्वाभाविक
गुणों में रमण करने वाले हो
और निर्मल ज्ञानधारी
आत्मिक गुणों के अनुकूल तथा
अनादि और अनंत हो | हे संसार के
शिरोमणि सिद्ध भगवान आप की सदा जय होवे |1|
ध्यान अग्निकर कर्म कलंक सबै दहे,
नित्य निरंजन देव स्वरुपी ह्वै रहे |
ज्ञायक ज्ञेयाकार ममत्व निवार के |
सो परमातम सिद्ध नमूँ सिर नाय के ||
अर्थ-
जिन्होनें शुक्ल ध्यान रुपी अग्नि से समस्त कर्म
रुपी कलंक को जता दिया, जो नित्य निर्दोष
देव रुप हो गये, जानने योग्य व जानने वाले
का पद मिटाकर उन सिद्ध परमात्मा को सिर झुकाकर
नमन करता हूँ |2|
अविचल ज्ञान
प्रकाशते, गुण अनन्त की खान |
ध्यान धरे सो पाइए, परम सिद्ध भगवान ||
अर्थ- जो निश्चल केवल ज्ञान से
प्रकाशमान है, अनंत गुणों के खान स्वरुप है ऐसे पूज्यनीय सिद्ध भगवान को
केवल ध्यान द्वारा ही पा सकते हैं |3|
अविनाशी आनन्द मय, गुण पूरण भगवान |
शक्ति हिये परमात्मा, सकल पदारथ जान ||
अर्थ- समस्त पदार्थों को जानने के
लिये अविनाशी, आनंद स्वरुप, गुणों से परिपूर्ण परमात्मा की शक्ति ह्रदय
में धारण करो |4|
इत्याशीर्वादः पुष्पांजलिं क्षिपेत् |
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