छंद : मदावलिप्त कपोल तथा रोकड़ (24 मात्रा)
छन्दः-
पुष्पदन्त भगवन्त सन्त सु जपंत तंत गुन |
महिमावन्त महन्त कन्त शिवतिय रमन्त मुन ||
काकन्दीपुर जन्म पिता सुग्रीव रमा सुत |
श्वेत वरन मनहरन तुम्हैं थापौं त्रिवार नुत ||
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् |
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् |
चालः- होली, तालः- जत्त
हिमवन गिरिगत गंगाजल भर, कंचन भृंग भराय |
करम कलंक निवारनकारन, जजौं, तुम्हारे पाय ||
मेरी अरज सुनीजे, पुष्पदन्त जिनराय, मेरी
अरज सुनीजे ||
ॐ ह्रीं
श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय
जन्मजरामृत्युविनाशनाय
जलं नि0स्वाहा |1|
बावन चन्दन कदलीनंदन,
कुंकुम संग घसाय |
चरचौं चरन हरन मिथ्यातम,
वीतराग गुण गाय ||मेरी0
ॐ ह्रीं
श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय
भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2|
शालि अखंडित सौरभमंडित,
शशिसम द्युति दमकाय |
ता को पुञ्ज धरौं चरननढिग,
देहु अखय पद राय ||मेरी0
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त
जिनेन्द्राय
अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतान् नि0स्वाहा |3|
सुमन सुमनसम
परिमलमंडित, गुंजत अलिगन आय |
ब्रह्म-पुत्र मद भंजन कारन,
जजौं तुम्हारे पाय ||मेरी0
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि0स्वाहा |4|
घेवर बावर फेनी गोंजा,
मोदन मोदक लाय |
छुधा वेदनि रोग हरन कों,
भेंट धरौं गुण गाय ||मेरी0
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय
क्षुधारोगविनाशनाय
नेवैद्यं नि0स्वाहा |5|
वाति कपूर दीप कंचनमय,
उज्ज्वल ज्योति जगाय |
तिमिर मोह नाशक तुमको लखि,
धरौं निकट उमगाय ||मेरी0
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त
जिनेन्द्राय मोहान्धकार
विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6|
दशवर गंध धनंजय के संग,
खेवत हौं गुन गाय |
अष्टकर्म ये दुष्ट जरें सो,
धूम सु धूम उड़ाय ||मेरी0
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त
जिनेन्द्राय
अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7|
श्रीफल मातुलिंग शुचि
चिरभट, दाड़िम आम मंगाय |
ता सों तुम पद पद्म जजत हौं,
विघन सघन मिट जाय ||मेरी0
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त
जिनेन्द्राय मोक्षफल
प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8|
जल फल सकल मिलाय मनोहर,
मनवचतन हुलसाय |
तुम पद पूजौं प्रीति लाय के,
जय जय त्रिभुवनराय ||
मेरी अरज सुनीजे,
पुष्पदन्त जिनराय, मेरी
अरज सनीजे ||
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त
जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं नि0स्वाहा |9|
पंच कल्याणक
अर्घ्यावली
नवमी तिथि कारी फागुन
धारी, गरभ मांहिं थिति देवा जी |
तजि आरण थानं कृपानिधानं,
करत शची तित सेवा जी ||
रतनन की धारा परम उदारा,
परी व्योम तें सारा जी |
मैं पूजौं ध्यावौं भगति
बढ़ावौं, करो मोहि भव पारा जी ||
ॐ ह्रीं
फाल्गुनकृष्णानवम्यां
गर्भमंगलप्राप्ताय
श्रीपुष्पदन्त
जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि0 |1|
मंगसिर सितपच्छं परिवा
स्वच्छं, जनमे तीरथनाथा जी
|
तब ही चवभेवा निरजर येवा,
आय नये निज माथा जी ||
सुरगिर नहवाये, मंगल गाये,
पूजे प्रीति लगाई जी |
मैं पूजौं ध्यावौं भगत
बढ़ावौं, निजनिधि हेतु
सहाई जी ||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्ला
प्रतिपदायां जन्ममंगलप्राप्ताय
श्रीपुष्प0
अर्घ्यं नि0 |2|
सित मंगसिर मासा तिथि
सुखरासा, एकम के दिन धारा जी |
तप आतमज्ञानी आकुलहानी,
मौन सहित अविकारा जी ||
सुरमित्र सुदानी के घर आनी,
गो-पय पारन कीना जी |
तिन को मैं वन्दौं पाप
निकंदौं, जो समता रस भीना
जी ||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्ला
प्रतिपदायां तपोमंगलप्राप्ताय
श्रीपुष्प0 अर्घ्यं नि0 |3|
सित कार्तिक गाये दोइज
घाये, घातिकरम परचंडा जी |
केवल परकाशे भ्रम तम नाशे,
सकल सार सुख मंडा जी ||
गनराज अठासी आनंदभासी,
समवसरण वृषदाता जी |
हरि पूजन आयो शीश नमायो, हम
पूजें जगत्राता जी ||
ॐ ह्रीं कार्तिकशुक्ला द्वितीयायां
ज्ञानमंगलप्राप्ताय श्रीपुष्प0
अर्घ्यं नि0 |4|
भादव सित सारा आठैं धारा,
गिरिसमेद निरवाना जी |
गुन अष्ट प्रकारा अनुपम
धारा, जय जय कृपा निधाना जी ||
तित इन्द्र सु आयौ, पूज
रचायौ,चिह्न तहां करि दीना जी |
मैं पूजत हौं गुन ध्यान मणी
सों, तुमरे रस में भीना जी ||
ॐ ह्री भाद्रपद शुक्लाऽष्टम्यां
मोक्षमंगलप्राप्ताय
श्रीपुष्प0 अर्घ्यं नि0 |5|
जयमाला
दोहाः- लच्छन मगर
सुश्वेत तन तुड्गं धनुष शत एक |
सुरनर वंदित मुकतिपति,
नमौं तुम्हें शिर टेक |1|
पुहुपदन्त गुनवदन है, सागर
तोय समान |
क्यों करि कर-अंजुलिनि कर,
करिये तासु प्रमान |2|
छन्द
तामरस, नमन मालिनी तथा चण्डी (16 मात्रा)
पुष्पदन्त जयवन्त
नमस्ते, पुण्य तीर्थंकर
सन्त नमस्ते |
ज्ञान ध्यान अमलान नमस्ते,
चिद्विलास सुख ज्ञान
नमस्ते |3|
भवभयभंजन देव नमस्ते,
मुनिगणकृत पद-सेव नमस्ते |
मिथ्या-निशि दिन-इन्द्र
नमस्ते, ज्ञानपयोदधि
चन्द्र नमस्ते |4|
भवदुःख तरु निःकन्द
नमस्ते, राग दोष मद हनन नमस्ते |
विश्वेश्वर गुनभूर नमस्ते,
धर्म सुधारस पूर नमस्ते |5|
केवल ब्रह्म प्रकाश
नमस्ते, सकल चराचरभास नमस्ते |
विघ्नमहीधर विज्जु नमस्ते,
जय ऊरधगति रिज्जु नमस्ते |6|
जय मकराकृत पाद नमस्ते,
मकरध्वज-मदवाद नमस्ते |
कर्मभर्म परिहार नमस्ते,
जय जय अधम-उद्धार नमस्ते |7|
दयाधुरंधर धीर नमस्ते, जय
जय गुन गम्भीर नमस्ते |
मुक्ति रमनि पति वीर
नमस्ते, हर्ता भवभय पीर नमस्ते |8|
व्यय उत्पति थितिधार
नमस्ते, निजअधार अविकार नमस्ते |
भव्य भवोदधितार नमस्ते, |'वृन्दावन'
निस्तार नमस्ते |9|
घत्ताः- जय जय
जिनदेवं हरिकृतसेवं, परम
धरमधन धारी जी |
मैं
पूजौं ध्यावौं गुनगन
गावौं, मेटो विथा हमारी जी |10|
ॐ ह्रीं
श्रीपुष्पदन्तजिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा |
छन्दः- पुहुपदंत पद सन्त,
जजें जो मनवचकाई |
नाचें गावें भगति करें, शुभ
परनति लाई ||
सो पावें सुख सर्व, इन्द्र
अहिमिंद तनों वर |
अनुक्रम तें निरवान, लहें
निहचै प्रमोद धर ||
इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
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