(छप्पय छंद, वीर रस, रुपकालंकार)
तप तुरंग असवार धार, तारन विवेक कर |
ध्यान शुकल असिधार शुद्ध सुविचार सुबखतर ||
भावन सेना, धर्म दशों सेनापति थापे |
रतन तीन धरि सकति, मंत्रि अनुभो निरमापे ||
सत्तातल सोहं सुभटि धुनि, त्याग केतु शत अग्र धरि |
इहविध समाज सज राज को, अर जिन जीते कर्म अरि ||
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट् |
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम
सन्निहितो भव भव वषट् |
अष्टक
छंद
त्रिभंगी अनुप्रयासक (मात्रा 32, जगणवर्जित)
कनमनिमय झारी, दृग
सुखकारी, सुर सरितारी नीर भरी |
मुनिमन सम उज्ज्वल, जनम
जरादल, सो ले पदतल धार करी ||
प्रभु दीन दयालं, अरिकुल
कालं, विरद विशालं सुकुमालं |
हरि मम जंजालं, हे जगपालं,
अरगुन मालं, वरभालं ||
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय
जन्मजरामृत्युविनाशनाय
जलं नि0स्वाहा |1|
भवताप नशावन, विरद
सुपावन, सुनि मन भावन, मोद भयो |
तातैं घसि बावन, चंदनपावन,
तुमहिं चढ़ावन, उमगि अयो ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय
भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2|
तंदुल अनियारे, श्वेत
सँवारे, शशिदुति टारे, थार भरे |
पद अखय सुदाता, जगविख्याता,
लखि भवत्राता पुंजधरे ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि0स्वाहा |3|
सुरतरु के शोभित, सुरन
मनोभित, सुमन अछोभित ले आयो |
मनमथ के छेदन, आप अवेदन, लखि
निरवेदन गुन गायो ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि0स्वाहा |4|
नेवज सज भक्षक प्रासुक
अक्षक, पक्षक रक्षक स्वक्ष धरी |
तुम करम निकक्षक, भस्म
कलक्षक, दक्षक पक्षक रक्ष करी ||
प्रभु दीन दयालं, अरिकुल
कालं, विरद विशालं सुकुमालं |
हरि मम जंजालं, हे जगपालं,
अरगुन मालं, वरभालं ||
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय
क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं नि0स्वाहा |5|
तुम भ्रमतम भंजन मुनिमन
कंजन, रंजन गंजन मोह निशा
रवि केवलस्वामी दीप जगामी,
तुम ढिग आमी पुण्य दृशा ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय
मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6|
दशधूप सुरंगी गंध अभंगी
वह्वि वरंगी माहिं हवें |
वसुकर्म जरावें धूम
उड़ावें, ताँडव भावें
नृत्य पवें ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय
अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7|
रितुफल अतिपावन, नयन
सुहावन, रसना भावन, कर लीने |
तुम विघन विदारक,
शिवफलकारक, भवदधि तारक
चरचीने ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय
मोक्षफल प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8|
सुचि स्वच्छ पटीरं,
गंधगहीरं, तंदुलशीरं, पुष्प-चरुं |
वर दीपं धूपं, आनंदरुपं, ले
फल भूपं, अर्घ करुं ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि0स्वाहा |9|
पंच कल्याणक अर्घ्यावली
छंद चौपाई (मात्रा 16)
फागुन सुदी तीज सुखदाई,
गरभ सुमंगल ता दिन पाई |
मित्रादेवी उदर सु आये, जजे
इन्द्र हम पूजन आये ||
ॐ ह्रीं फाल्गुनशुक्ला तृतीयायां
गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |1|
मँगसिर शुक्ल चतुर्दशि
सोहे, गजपुर जनम भयो जग मोहे |
सुर गुरु जजे मेरु पर जाई,
हम इत पूजें मनवचकाई ||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्ला चतुर्दश्यां
जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |2|
मंगसिर सित दसमी दिन
राजे, ता दिन संजम धरे विराजै |
अपराजित घर भोजन पाई, हम
पूजें इत चित हरषाई ||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्ला दशम्यां
तपोमंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |3|
कार्तिक सित द्वादशि
अरि चूरे, केवलज्ञान भयो गुन पूरे |
समवसरन तिथि धरम बखाने, जजत
चरन हम पातक भाने ||
ॐ ह्रीं कार्तिकशुक्ला द्वादश्यां
ज्ञानमंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |4|
चैत कृष्ण अमावसी सब
कर्म, नाशि वास किय शिव-थल पर्म |
निहचल गुन अनंत भंडारी,
जजौं देव सुधि लेहु हमारी ||
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णाअमावस्यायां
मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |5|
जयमाला
दोहा छन्द -
जमकपद तथा लाटानुबंधन
बाहर भीतर के जिते, जाहर
अर दुखदाय |
ता हर कर अर जिन भये, साहर
शिवपुर राय |1|
राय सुदरशन जासु पितु,
मित्रादेवी माय |
हेमवरन तन वरष वर, नव्वै
सहस सुआय |2|
(छन्द तोटक वर्ण 12)
जय श्रीधर श्रीकर
श्रीपति जी, जय श्रीवर
श्रीभर श्रीमति जी |
भवभीम भवोदधि तारन हैं,
अरनाथ नमों सुखकारन हैं |3|
गरभादिक मंगल सार धरे, जग
जीवनि के दुखदंद हरे |
कुरुवंश शिखामनि तारन हैं,
अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |4|
करि राज छखंड विभूति मई, तप
धारत केवलबोध ठई |
गण तीस जहाँ भ्रमवारन हैं,
अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |5|
भविजीवन को उपदेश दियो,
शिवहेत सबै जन धारि लियो |
जग के सब संकट टारन हैं,
अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |6|
कहि बीस प्ररुपन सार तहाँ,
निजशर्म सुधारस धार जहाँ |
गति चार ह्रषीपन धारन हैं,
अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |7|
षट काय तिजोग तिवेद मथा,
पनवीस कषा वसु ज्ञान तथा |
सुर संजम भेद पसारन हैं,
अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |8|
रस दर्शन लेश्या भव्य जुगं,
षट सम्यक् सैनिय भेद युगं |
जुग हारा तथा सु अहारन हैं,
अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |9|
गुनथान चतुर्दस मारगना,
उपयोग दुवादश भेद भना |
इमि बीस विभेद उचारन हैं,
अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |10|
इन आदि समस्त बखान कियो,
भवि जीवनि ने उर धार लियो |
कितने शिववादिन धारन हैं,
अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |11|
फिर आप अघाति विनाश सबै,
शिवधाम विषैं थित कीन तबै |
कृतकृत्य प्रभू जगतारन
हैं अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |12|
अब दीनदयाल दया धरिये, मम
कर्म कलंक सबै हरिये |
तुमरे गुन को कछु पार न है,
अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |13|
घत्तानन्द छन्द (मात्रा 31)
जय श्रीअरदेवं,
सुरकृतसेवं समताभेवं, दातारं |
अरिकर्म विदारन,
शिवसुखकारन, जयजिनवर जग त्रातारं ||
ॐ ह्रीं
श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा |
अर जिन के पदसारं, जो पूजै
द्रव्य भाव सों प्राणी |
सो पावै भवपारं, अजरामर
मोक्षथान सुखखानी ||
इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्) |
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