छन्दः- या भव कानन में
चतुरानन, पाप पनानन घेरी हमेरी |
आतम जानन मानन ठानन, बान न होन दई सठ मेरी ||
तामद भानन आपहि हो, यह छान न आन न आनन टेरी |
आन गही शरनागत को, अब श्रीपतजी पत राखहु मेरी ||
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट् |
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्र !
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्र !
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् |
(छंद
त्रिभंगी, अनुप्रयासक -
मात्रा 12 जगण वर्जित)
हिमगिरि गतगंगा, धार
अभंगा, प्रासुक संगा, भरि भृंगा |
जर-जनम-मृतंगा, नाशि अघंगा,
पूजि पदंगा मृदु हिंगा ||
श्री शान्ति जिनेशं,
नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं |
हनि अरिचक्रेशं, हे
गुनधेशं, दयाऽमृतेशं,
मक्रेशं ||
ॐ ह्रीं
श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
जन्मजरामृत्युविनाशनाय
जलं नि0स्वाहा |1|
वर बावन चन्दन, कदली
नन्दन, घन आनन्दन सहित घसौं |
भवताप निकन्दन, ऐरानन्दन,
वंदि अमंदन, चरन बसौं ||श्री0
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2|
हिमकर करि लज्जत, मलय
सुसज्जत अच्छत जज्जत, भरि थारी |
दुखदारिद गज्जत, सदपद
सज्जत, भवभय भज्जत, अतिभारी
||श्री0 ॐ ह्रीं
श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि0स्वाहा |3|
मंदार, सरोजं, कदली जोजं,
पुंज भरोजं, मलयभरं |
भरि कंचनथारी, तुमढिग धारी,
मदनविदारी, धीरधरं ||श्री0
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं
नि0स्वाहा |4|
पकवान नवीने, पावन कीने
षटरस भीने, सुखदाई |
मनमोदन हारे, छुधा विदारे,
आगे धारे गुनगाई ||श्री0
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
क्षुधारोगविनाशनाय
नेवैद्यं नि0स्वाहा |5|
तुम ज्ञान प्रकाशे,
भ्रमतम नाशे, ज्ञेय विकासे
सुखरासे |
दीपक उजियारा, यातें धारा,
मोह निवारा, निज भासे ||श्री0
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6|
चन्दन करपूरं करि वर
चूरं, पावक भूरं माहि जुरं |
तसु धूम उड़ावे, नाचत जावे,
अलि गुंजावे मधुर सुरं ||श्री0
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7|
बादाम खजूरं, दाड़िम
पूरं, निंबुक भूरं ले आयो |
ता सों पद जज्जौं,शिवफल
सज्जौं, निजरस रज्जौं उमगायो ||
श्री शान्ति जिनेशं,
नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं |
हनि अरिचक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं,
मक्रेशं ||
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
मोक्षफल प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8|
वसु द्रव्य सँवारी, तुम
ढिग धारी, आनन्दकारी, दृग-प्यारी |
तुम हो भव तारी, करुनाधारी,
या तें थारी शरनारी ||श्री0
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि0स्वाहा |9|
पंच कल्याणक अर्घ्यावली
छन्दः- असित सातँय
भादव जानिये, गरभ मंगल ता दिन मानिये |
सचि कियो जननी पद चर्चनं,
हम करें इत ये पद अर्चनं ||
ॐ ह्रीं
भाद्रपदकृष्णा सप्तम्यां
गर्भमंगलमंडिताय
श्रीशान्ति0अर्घ्यं नि0स्वाहा |1|
जनम जेठ चतुर्दशि श्याम
है, सकल इन्द्र सु आगत धाम है |
गजपुरै गज-साजि सबै तबै,
गिरि जजे इत मैं जजिहों अबै
||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां
जन्ममंगलमंडिताय
श्रीशान्ति0अर्घ्यं नि0स्वाहा |2|
भव शरीर सुभोग असार हैं,
इमि विचार तबै तप धार हैं |
भ्रमर चौदशि जेठ सुहावनी,
धरम हेत जजौं गुन पावनी ||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां
तपोमंगलमंडिताय
श्रीशान्ति0अर्घ्यं नि0स्वाहा |3|
शुकलपौष दशैं सुखरास है,
परम-केवल-ज्ञान प्रकाश है |
भवसमुद्र उधारन देव की, हम
करें नित मंगल सेवकी ||
ॐ ह्रीं पौषशुक्लादशम्यां
केवलज्ञानमंडिताय
श्रीशान्ति0अर्घ्यं नि0स्वाहा |4|
असित चौदशि जेठ हने अरी,
गिरि समेदथकी शिव-तिय वरी |
सकल इन्द्र जजैं तित आय के,
हम जजैं इत मस्तक नाय के ||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां
मोक्षमंगलमंडिताय
श्रीशान्ति0अर्घ्यं नि0स्वाहा |5|
जयमाला
(छन्द रथोद्धता,
चन्द्र वत्स तथा चन्द्रवर्त्म)
शान्ति शान्तिगुन
मंडिते सदा, जाहि ध्यावत
सुपंडिते सदा |
मैं तिन्हें भगत मंडिते
सदा, पूजिहौं कलषु हंडिते सदा ||
मोच्छ हेत तुम ही दयाल हो,
हे जिनेश गुन रत्न माल हो |
मैं अबै सुगुन-दाम ही धरौं,
ध्यावते तुरत मुक्ति-तिय
वरौं ||
छन्द पद्धरि (मात्रा 15)
जय शान्तिनाथ चिद्रुपराज, भवसागर में
अद्भुत जहाज |
तुम तजि सरवारथसिद्धि थान,
सरवारथजुत गजपुर महान |1|
तित जनम लियो आनन्द धार,
हरि ततछिन आयो राजद्वार |
इन्द्रानी जाय प्रसूति
थान, तुम को कर में ले हरष मान |2|
हरि गोद देय सो मोदधार, सिर
चमर अमर ढारत अपार |
गिरिराज जाय तित शिला
पांडु, ता पे थाप्यो अभिषेक माँड |3|
तेत पंचम उदधि तनों सु वारि,
सुर कर कर करि ल्याये उदार |
तब इन्द्र सहसकर करि अनन्द,
तुम सिर धारा ढारयो समुन्द |4|
अघ घघ धुनि होत घोर, भभभभ भभ
धध धध कलश शोर |
दृमदृम दृमदृम बाजत मृदंग,
झन नन नन नन नन नूपुरंग |5|
तन नन नन नन नन तनन तान, घन
नन नन घंटा करत ध्वान |
ताथेई थेई थेई थेई सुचाल,
जुत नाचत नावत तुमहिं भाल |6|
चट चट चट अटपट नटत नाट, झट झट
झट हट नट थट विराट |
इमि नाचत राचत भगति रंग,
सुर लेत जहाँ आनन्द संग |7|
इत्यादि अतुल मंगल सु ठाठ,
तित बन्यो जहाँ सुर गिरि विराट |
पुनि करि नियोग पितुसदन आय,
हरि सौप्यो तुम तित वृद्ध थाय |8|
पुनि राजमाहिं लहि
चक्ररत्न, भोग्यो छहखण्ड
करि धरम जत्न |
पुनि तप धरि केवल रिद्धि
पाय, भवि जीवनि को शिवमग बताय |9|
शिवपुर पहुंचे तुम हे
जिनेश, गुण-मंडित अतुल
अनन्त भेष |
मैं ध्यावतु हौं नित शीश
नाय, हमरी भवबाधा हर जिनाय |10|
सेवक अपनो निज जान जान,
करुणा करि भौभय भान भान |
यह विघन मूल तरु खंड खंड,
चितचिन्तित आनन्द मंड मंड |11|
छन्दः-
श्रीशान्ति महंता, शिवतियकंता, सुगुन अनंता, भगवंता |
भव
भ्रमन हनन्ता, सौख्य
अनन्ता, दातारं, तारनवन्ता ||
ॐ ह्रीं
श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय
पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
(छन्द रुपक सवैया - मात्रा 31)
शान्तिनाथ जिन के
पदपंकज, जो भवि पूजें मन वच काय |
जनम जनम के पातक ता के,
ततछिन तजि के जायं पलाय ||
मनवांछित सुख पावे सो नर,
बांचे भगतिभाव अति लाय |
ता तें 'वृन्दावन' नित वंदे,
जा तें शिवपुरराज कराय ||
इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
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