माधवी तथा
किरीट छंद ( 7 सगण व गुरु )
तजि के सरवारथसिद्धि
विमान, सुभान के आनि आनन्द बढ़ाये |
जगमात सुव्रति के नन्दन
होय, भवोदधि डूबत जंतु कढ़ाये ||
जिनके गुन नामहिं प्रकाश
है, दासनि को शिवस्वर्ग मँढ़ाये |
तिनके पद पूजन हेत त्रिबार,
सुथापतु हौं इहं फूल चढ़ाये ||
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट् |
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र !
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र !
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् |
अष्टक
मुनि मन सम शुचि शीर
नीर अति, मलय मेलि भरि झारी |
जनमजरामृत ताप हरन को,
चरचौं चरन तुम्हारी ||
परमधरम-शम-रमन धरम-जिन,
अशरन शरन निहारी |
पूजौं पाय गाय गुन सुन्दर
नाचौं दे दे तारी ||
ॐ ह्रीं
श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
जन्मजरामृत्युविनाशनाय
जलं नि0स्वाहा |1|
केशर चन्दन कसली नन्दन,
दाहनिकन्दन लीनि |
जलसंग घस लसि शसिसम शमकर,
भव आताप हरीनो |परम0
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2|
जलज जीर सुखदास हीर हिम,
नीर किरनसम लायो |
पुंज धरत आनन्द भरत भव, दंद
हरत हरषायो ||परम0
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतान् नि0स्वाहा |3|
सुमन सुमन सम सुमणि थाल
भर, सुमनवृन्द विहंसाई |
सुमन्मथ-मद-मंथन के कारन,
अरचौं चरन चढ़ाई ||परम0
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं
नि0स्वाहा |4|
घेवर बावर अर्द्ध
चन्द्र सम, छिद्र सहज
विराजे |
सुरस मधुर ता सों पद पूजत,
रोग असाता भाजै ||परम0
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
क्षुधारोगविनाशनाय
नेवैद्यं नि0स्वाहा |5|
सुन्दर नेह सहित वर दीपक,
तिमिर हरन धरि आगे |
नेह सहित गाऊँ गुन श्रीधर,
ज्यों सुबोध उर जागे ||परम0
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6|
अगर तगर कृष्णागर तव दिव
हरिचन्दन करपूरं |
चूर खेय ज्वलन मांहि जिमि,
करम जरें वसु कूरं ||परम0
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7|
आम्र काम्रक अनार सारफल,
भार मिष्ट सुखदाई |
सो ले तुम ढिग धरहुँ
कृपानिधि, देहु मोच्छ
ठकुराई ||परम0
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
मोक्षफल प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8|
आठों दरब साज शुचि चितहर,
हरषि हरषि गुनगाई |
बाजत दृमदृम दृम मृदंग गत,
नाचत ता थेई थाई ||परम0
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं नि0स्वाहा |9|
पंच
कल्याणक अर्घ्यावली
(राग
टम्पा की, चाल-खोयो रे
गंवार)
पूजौं हो अबार, धरम
जिनेसुर पूजौं ||टेक
आठैं सित बैशाख की हो, गरभ
दिवस अधिकार |
जगजन वांछित पूर को, पूजौं
हो अबार ||धरम0
ॐ ह्रीं
वैशाखशुक्ला अष्टम्यां
गर्भमंगलप्राप्ताय
श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं निर्व0 |1|
शुकल माघ तेरसि लयो हो,
धरम धरम अवतार |
सुरपति सुरगिर पूजियो,
पूजौं हो अबार ||धरम0
ॐ ह्रीं माघशुक्ला त्रयोदश्यां
जन्ममंगलप्राप्ताय
श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं
निर्व0 |2|
माघशुक्ल तेरस लयो हो,
दुर्द्धर तप अविष्कार |
सुरऋषि सुमनन तें पूजें,
पूजौं हो अबार ||धरम0
ॐ ह्रीं माघशुक्ला
त्रयोदश्यां तपोमंगलप्राप्ताय
श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं निर्व0 |3|
पौषशुक्ल पूनम हने अरि,
केवल लहि भवितार |
गण-सुर-नरपति पूजिया, पूजौं
हो अबार ||धरम0
ॐ ह्रीं पौषशुक्ला पूर्णिमायां
केवलज्ञानप्राप्ताय
श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं निर्व0 |4|
जेठशुकल तिथि चौथ की हो,
शिव समेद तें पाय |
जगतपूज्यपद पूजहूँ, पूजौं
हो अबार ||धरम0
ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्ला
चतुर्थ्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय
श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं निर्व0 |5|
जयमाला
दोहाः- घनाकार करि
लोक पट, सकल उदधि मसि तंत |
लिखै
शारदा कलम गहि, तदपि न तुव
गुन अंत |1|
छन्द पद्धरी
जय धरमनाथ जिन गुनमहान,
तुम पद को मैं नित धरौं ध्यान |
जय गरभ जनम तप ज्ञानयुक्त,
वर मोच्छ सुमंगल शर्म-भुक्त |2|
जय चिदानन्द आनन्दकंद,
गुनवृन्द सु ध्यावत मुनि अमन्द |
तुम जीवनि के बिनु हेतु
मित्त, तुम ही हो जग में जिन पवित्त |3|
तुम समवसरण में तत्वसार,
उपदेश दियो है अति उदार |
ता को जे भवि निजहेत चित्त,
धारें ते पावें मोच्छवित्त |4|
मैं तुम मुख देखत आज पर्म,
पायो निज आतमरुप धर्म |
मो कों अब भवदधि तें निकार,
निरभयपद दीजे परमसार |5|
तुम सम मेरो जग में न कोय,
तुमही ते सब विधि काज होय |
तुम दया धुरन्धर धीर वीर,
मेटो जगजन की सकल पीर |6|
तुम नीतिनिपुन विन रागरोष,
शिवमग दरसावतु हो अदोष |
तुम्हरे ही नामतने प्रभाव,
जगजीव लहें शिव-दिव-सुराव |7|
ता तें मैं तुमरी शरण आय, यह
अरज करतु हौं शीश नाय |
भवबाधा मेरी मेट मेट,
शिवराधा सों करौं भेंट भेंट |8|
जंजाल जगत को चूर चूर,
आनन्द अनूपम पूर पूर |
मति देर करो सुनि अरज एव, हे
दीनदयाल जिनेश देव |9|
मो कों शरना नहिं और ठौर, यह
निहचै जानो सुगुन मौर |
'वृन्दावन' वंदत प्रीति लाय, सब विघन मेट हे धरम-राय |10|
छन्द घत्तानंद
जय श्रीजिनधर्मं, शिवहितपर्मं,
श्रीजिनधर्मं उपदेशा |
तुम दयाधुरंधर विनतपुरन्दर, कर उरमन्दर परवेशा |11|
ॐ ह्रीं
श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा |
जो श्रीपतिपद जुगल, उगल
मिथ्यात जजे भव |
ता के दुख सब मिटहिं, लहे
आनन्द समाज सब ||
सुर-नर-पति-पद भोग, अनुक्रम तें शिव जावे |
ता तें 'वृन्दावन' यह जानि,
धरम-जिन के गुन ध्यावे ||
इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्) |
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