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श्री
मंगलाष्टक स्तोत्र
Part 2 |
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ज्योतिर्व्यन्तर-भावनामरग्रहे
मेरौ कुलाद्रौ स्थिताः,
जम्बूशाल्मलि-चैत्य-शखिषु
तथा वक्षार-रुप्याद्रिषु|
इक्ष्वाकार-गिरौ च
कुण्डलादि द्वीपे च
नन्दीश्वरे,
शैले ये मनुजोत्तरे जिन-ग्रहाः
कुर्वन्तु नः मंगलम्||
अर्थ - ज्योतिषी, व्यंतर,
भवनवासी और वैमानिकों केआवासों के, मेरुओं,
कुलाचकों, जम्बू वृक्षों
औरशाल्मलि वृक्षों,
वक्षारों विजयार्धपर्वतों,इक्ष्वाकार
पर्वतों, कुण्डलवर (तथा
रुचिक वर), नन्दीश्वर द्वीप,
और मानुषोत्तर पर्वत के
सभी अकृत्रिम जिन
चैत्यालय हमारे पापों काक्षयकरेंऔरहमें सुखी
बनावें|6|
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कैलाशे
वृषभस्य निर्व्रतिमही
वीरस्य पावापुरे|
चम्पायां
वसुपूज्यसुज्जिनपतेः
सम्मेदशैलेऽर्हताम्|
शेषाणामपि
चोर्जयन्तशिखरे
नेमीश्वरस्यार्हतः,
निर्वाणावनयः
प्रसिद्धविभवाः
कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ
- भगवान ऋषभदेव की
निर्वाणभूमि - कैलाश पर्वत,
महावीर स्वामी कीपावापुर,
वासुपूज्य स्वामी (राजा
वसुपूज्य के पुत्र) की
चम्पापुरी, नेमिनाथ
स्वामी की ऊर्जयन्त पर्वत
शिखर, और शेष बीस
तीर्थंकरों की श्री
सम्मेदशिखर पर्वत, जिनका
अतिशय और वैभव विख्यात है
ऐसी ये सभी निर्वाण
भूमियाँ हमें निष्पाप
बनावें और हमें सुखी करें|7|
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यो
गर्भावतरोत्सवो भगवतां
जन्माभिषेकोत्सवो,
यो जातः परिनिष्क्रमेण
विभवो यः केवलज्ञानभाक्|
यः कैवल्यपुर-प्रवेश-महिमा
सम्पदितः स्वर्गिभिः
कल्याणानि च तानि पंच सततं
कुर्वन्तु नः मंगलम्|| अर्थ
- तीर्थंकरों के
गर्भकल्याणक, जन्माभिषेक
कल्याणक, दीक्षा कल्याणक,
केवलज्ञान कल्याणक और
कैवल्यपुर प्रवेश (निर्वाण)
कल्याणक के देवों द्वारा
सम्पादित महोत्सव हमें
सर्वदा मांगलिक रहें |8|
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सर्पो
हारलता भवत्यसिलता
सत्पुष्पदामायते,
सम्पद्येत रसायनं विषमपि
प्रीतिं विधत्ते रिपुः|
देवाः यान्ति वशं
प्रसन्नमनसः किं वा बहु
ब्रूमहे,
धर्मादेव नभोऽपि वर्षति
नगैः कुर्वन्तु नः मंगलम्||
अर्थ -
धर्म के प्रभाव से सर्प
माला बन जाता है, तलवार
फूलों के समान कोमल बन जाती
है, विष अमृत बन जाता है,
शत्रु प्रेम करने वाला
मित्र बन जाता है और देवता
प्रसन्न मन से धर्मात्मा
के वश में हो जाते हैं| अधिक
क्या कहें, धर्म से ही आकाश
से रत्नों की वर्षा होने
लगती है| वही धर्म हम सबका
कल्याणकरे|9|
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इत्थं
श्रीजिन-मंगलाष्टकमिदं
सौभाग्य-सम्पत्करम्,
कल्याणेषु महोत्सवेषु
सुधियस्तीर्थंकराणामुषः|
ये श्र्रण्वन्ति पठन्ति
तैश्च सुजनैः धर्मार्थ-कामाविन्ताः,
लक्ष्मीराश्रयते व्यपाय-रहिता
निर्वाण-लक्ष्मीरपि||
अर्थ -
सोभाग्यसम्पत्ति को
प्रदान करने वाले इस श्री
जिनेन्द्र मंगलाष्टक को
जो सुधी तीर्थंकरों के पंच
कल्याणक के महोत्सवों के
अवसर पर तथा प्रभातकाल में
भावपूर्वक सुनते और पढ़ते
हैं, वे सज्जन धर्म, अर्थ और
काम से समन्वित लक्ष्मी के
आश्रय बनते हैं और पश्चात्
अविनश्वर मुक्तिलक्ष्मी
को भी प्राप्त करते हैं|10|
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