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श्री
मंगलाष्टक स्तोत्र
Part 1 |
अर्हन्तो
भगवत इन्द्रमहिताः,
सिद्धाश्च सिद्धीश्वरा,
आचार्याः
जिनशासनोन्नतिकराः,
पूज्या उपाध्यायकाः|
श्रीसिद्धान्तसुपाठकाः,
मुनिवरा रत्नत्रयाराधकाः,
पञ्चैते परमेष्ठिनः
प्रतिदिनं, कुर्वन्तु नः
मंगलम्||
अर्थ - इन्द्रों
द्वारा जिनकी पूजा की गई,
ऐसे अरिहन्त भगवान, सिद्ध
पद के स्वामी ऐसे सिद्ध
भगवान, जिन शासन को
प्रकाशित करने वाले ऐसे
आचार्य, जैन सिद्धांत को
सुव्यवस्थित पढ़ाने वाले
ऐसे उपाध्याय, रत्नत्रय के
आराधक ऐसे साधु, ये पाँचों
मरमेष्ठी प्रतिदिन हमारे
पापों को नष्ट करें और हमें
सुखी करे|1|
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श्रीमन्नम्र
- सुरासुरेन्द्र - मुकुट -
प्रद्योत - रत्नप्रभा-
भास्वत्पादनखेन्दवः
प्रवचनाम्भोधीन्दवः
स्थायिनः|
ये सर्वे जिन-सिद्ध-सूर्यनुगतास्ते
पाठकाः साधवः
स्तुत्या योगीजनैश्च
पञ्चगुरवः कुर्वन्तु नः
मंगलम्||
अर्थ - शोभायुक्त और
नमस्कार करते हुए
देवेन्द्रों और
असुरेन्द्रो के मुकुटों
के चमकदार रत्नों की
कान्ति से जिनके श्री
चरणों के नखरुपी चन्द्रमा
की ज्योति स्फुरायमान हो
रही है, और जो प्रवचन रुप
सागर की वृद्धि करने के लिए
स्थायी चन्द्रमा हैं एवं
योगीजन जिनकी स्तुति करते
रहते हैं, ऐसे अरिहन्त,
सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और
साधु ये पांचों परमेष्ठी
हमारे पापों को क्षय करें
और हमें सुखी करें|2|
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सम्यग्दर्शन-बोध-व्रत्तममलं,
रत्नत्रयं पावनं,
मुक्ति श्रीनगराधिनाथ -
जिनपत्युक्तोऽपवर्गप्रदः|
धर्म सूक्तिसुधा च
चैत्यमखिलं, चैत्यालयं
श्रयालयं,
प्रोक्तं च त्रिविधं
चतुर्विधममी, कुर्वन्तु
नः मंगलम्||
अर्थ - निर्मल
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान
और सम्यक्चारित्र ये
पवित्र रत्नत्रय हैं|
श्रीसम्पन्न मुक्तिनगर के
स्वामी भगवान् जिनदेव ने
इसे अपवर्ग (मोक्ष) को देने
वाला कहा है| इस त्रयी के
साथ धर्म सूक्तिसुधा (जिनागम),
समस्त जिन-प्रतिमा और
लक्ष्मी का आकारभूत
जिनालय मिलकर चार प्रकार
का धर्म कहा गया है वह
हमारे पापों का क्षय करें
और हमें सुखी करे|3|
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नाभेयादिजिनाः
प्रशस्त-वदनाः
ख्याताश्चतुर्विंशतिः,
श्रीमन्तो भरतेश्वर-प्रभृतयो
ये चक्रिणो द्वादश|
ये विष्णु-प्रतिविष्णु-लांगलधराः
सप्तोत्तराविंशतिः,
त्रैकाल्ये
प्रथितास्त्रिषष्टि-पुरुषाः
कुर्वन्तु नः मंगलम्||
अर्थ - तीनों लोकों
में विख्यात और बाह्य तथा
अभ्यन्तर लक्ष्मी सम्पन्न
ऋषभनाथ भगवान आदि 24
तीर्थंकर, श्रीमान्
भरतेश्वर आदि 12 चक्रवर्ती, 9
नारायण, 9 प्रतिनारायण और 9
बलभद्र, ये 63 शलाका
महापुरुष हमारे पापों का
क्षय करें और हमें सुखी करे|4|
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ये
सर्वौषध-ऋद्धयः सुतपसो
वृद्धिंगताः पञ्च ये,
ये चाष्टाँग-महानिमित्तकुशलाः
येऽष्टाविधाश्चारणाः|
पञ्चज्ञानधरास्त्रयोऽपि
बलिनो ये
बुद्धिऋद्धिश्वराः,
सप्तैते सकलार्चिता
मुनिवराः कुर्वन्तु नः
मंगलम्||
अर्थ - सभी औषधि ऋद्धिधारी,
उत्तम तप से वृद्धिगत पांच,
अष्टांग
महानिमित्तज्ञानी, आठ
प्रकार की चारण ऋद्धि के
धारी, पांच प्रकार की ज्ञान
ऋद्धियों के धारी, तीन
प्रकार की बल ऋद्धियों के
धारी, बुद्धि ऋद्धिधारी
ऐसे सातों प्रकारों के जगत
पूज्य गणनायक मुनिवर
हमारा मंगल करे|5|
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