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 एकीभावस्तोत्रम्
  
[श्रीवादिराज]   
   कविवर भूधरदास जी कृत भाषानुवाद 
         (Continue...)

जो नर निर्मल ज्ञान मान शुचि चारित साधै|
अनवधि सुख की सार भक्ति कूंची नहिं लांघे||
सो शिव वांछक पुरुष मोक्ष पट केम उघारे|
मोह मुहर दिढ़ करी मोक्ष मंदिर के द्वारै|13|

शिवपुर केरो पंथ पाप-तम सों अतिछायो|
दुःख सरुप बहु कूप-खाई सों विकट बतायो||
स्वामी सुख सों तहां कौन जन मारग लागें!
प्रभु-प्रवचन मणि दीप जोन के आगे आगे|14|

कर्म पटल भू माहिं दबी आतम निधि भारी|
देखत अतिसुख होय विमुख जन नाहिं उघारी||
तुम सेवक ततकाल ताहि निहचै कर धारै|
थुति कुदाल सों खोद बंद भू कठिन विदारै|15|

स्याद् वाद-गिरि उपज मोक्ष सागर लों धाई|
तुम चरणांबुज परस भक्ति गंगा सुखदाई||
मो चित निर्मल थयो न्होन रुचि पूरव तामें|
अब वह हो न मलीन कौन जिन संशय या में|16|

तुम शिव सुखमय प्रगट करत प्रभु चिंतन तेरो|
मैं भगवान समान भाव यों वरतै मेरो||
यदपि झूठ है तदपि त्रप्ति निश्चल उपजावे|
तुव प्रसाद सकलंक जीव वांछित फल पावे|17|

वचन जलधि तुम देव सकल त्रिभुवन में व्यापे|
भंग-तरंगिनि विकथ-वाद-मल मलिन उथापे||
मन सुमेरु सों मथे ताहि जे सम्यज्ञानी|
परमामृत सों तृप्त होहिं ते चिरलों प्रानी|18|

जो कुदेव छविहीन वसन भूषन अभिलाखे|
वैरी सों भयभीत होय सो आयुध राखे||
तुम सुंदर सर्वांग शत्रु समरथ नहिं कोई|
भूषन वसन गदादि ग्रहन काहे को होई|19|

सुरपति सेवा करे कहा प्रभु प्रभुता तेरी|
सो सलाघना लहै मिटे जग सों जग फेरी||
तुम भव जलधि जिहाज तोहि शिव कंत उचरिये|
तुही जगत-जनपाल नाथ थुति की थुति करिये|20|

वचन जाल जड़ रुप आप चिन्मूरति झांई|
तातैं थुति आलाप नाहिं पहुंचे तुम तांई||
तो भी निर्फल नाहिं भक्ति रस भीने वायक|
संतन को सुर तरु समान वांछित वरदायक|21|

कोप कभी नहिं करो प्रीति कबहूं नहिं धारो|
अति उदास बेचाह चित्त जिनराज तिहांरो||
तदपि आन जग बहै बैर तुम निकट न लहिये|
यह प्रभुता जगतिलका कहां तुम बिन सरदहिये|22||

सुरतिय गावें सुजश सर्व गति ज्ञान स्वरुपी|
जो तुमको थिर होहिं नमैं भवि आनंद रुपी||
ताहि छेमपुर चलन वाट बाकी नहिं हो हैं|
श्रुत के सुमरन माहिं सो न कबहूं नर मोहै|23|

अतुल चतुष्टय रूप तुम्हें जो चित में धारे|
आदर सों तिहुं काल माहिं जग थुति विस्तारे||
सो सुकृत शिव पंथ भक्ति रचना कर पूरे|
पंच कल्यानक ऋद्धि पाय निहचै दुःख चूरे|24|

अहो जगत पति पूज्य अवधि ज्ञानी मुनि हारे|
तुम गुन कीर्तन माहिं कौन हम मंद विचारे||
थुति छल सों तुम विषै देव आदर विस्तारे|
शिव सुख-पूरनहार कलपतरु यही हमारे|25|

वादिराज मुनि तें अनु, वैयाकरणी सारे|
वादिराज मुनि तें अनु, तार्किक विद्यावारे||
वादिराज मुनि तें अनु, हैं काव्यन के ज्ञाता|
वादिराज मुनि तें अनु, हैं भविजन के त्राता|26|

दोहा - मूल अर्थ बहु विधि कुसुम, भाषा सूत्र मँझार|
           भक्ति माल 'भूधर' करी, करो कंठ सुखकार||
                                       END

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                                                                        (Hindi Version)

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