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33. सुगंधित जल
बिन्दुओं और मन्द
सुगन्धित वायु के साथ
गिरने वाले श्रेष्ठ मनोहर
मन्दार, सुन्दर, नमेरु,
पारिजात, सन्तानक आदि
कल्पवृक्षों के पुष्पों
की वर्षा आपके वचनों की
पंक्तियों की तरह आकाश से
होती है|
34. हे प्रभो! तीनों लोकों
के कान्तिमान पदार्थों की
प्रभा को तिरस्कृत करती
हुई आपके मनोहर भामण्डल की
विशाल कान्ति एक साथ उगते
हुए अनेक सूर्यों की
कान्ति से युक्त होकर भी
चन्द्रमा से शोभित रात्रि
को भी जीत रही है|
35. आपकी दिव्यध्वनि
स्वर्ग और मोक्षमार्ग की
खोज में साधक, तीन लोक के
जीवों को समीचीन धर्म का
कथन करने में समर्थ, स्पष्ट
अर्थ वाली, समस्त भाषाओं
में परिवर्तित करने वाले
स्वाभाविक गुण से सहित
होती है|
36. पुष्पित नव स्वर्ण
कमलों के समान शोभायमान
नखों की किरण प्रभा से
सुन्दर आपके चरण जहाँ
पड़ते हैं वहाँ देव गण
स्वर्ण कमल रच देते हैं|
37. हे जिनेन्द्र! इस प्रकार
धर्मोपदेश के कार्य में
जैसा आपका ऐश्वर्य था वैसा
अन्य किसी का नही हुआ|
अंधकार को नष्ट करने वाली
जैसी प्रभा सूर्य की होती
है वैसी अन्य प्रकाशमान भी
ग्रहों की कैसे हो सकती है?
38. आपके आश्रित मनुष्यों
को, झरते हुए मद जल से जिसके
गण्डस्थल मलीन, कलुषित तथा
चंचल हो रहे है और उन पर
उन्मत्त होकर मंडराते हुए
काले रंग के भौरे अपने
गुजंन से क्रोध बढा़ रहे
हों ऐसे ऐरावत की तरह
उद्दण्ड, सामने आते हुए
हाथी को देखकर भी भय नहीं
होता|
39. सिंह, जिसने हाथी का
गण्डस्थल विदीर्ण कर,
गिरते हुए उज्ज्वल तथा
रक्तमिश्रित गजमुक्ताओं
से पृथ्वी तल को विभूषित
कर दिया है तथा जो छलांग
मारने के लिये तैयार है वह
भी अपने पैरों के पास आये
हुए ऐसे पुरुष पर आक्रमण
नहीं करता जिसने आपके चरण
युगल रुप पर्वत का आश्रय ले
रखा है|
40. आपके नाम यशोगानरुपी जल,
प्रलयकाल की वायु से उद्धत,
प्रचण्ड अग्नि के समान
प्रज्वलित, उज्ज्वल
चिनगारियों से युक्त,
संसार को भक्षण करने की
इच्छा रखने वाले की तरह
सामने आती हुई वन की अग्नि
को पूर्ण रुप से बुझा देता
है|
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