मन्ये वरं
हरिहरादय एव दृष्टा
दृष्टेषु येषु ह्रदयं
त्मयि तोषमेति|
किं वीक्षितेन भवता भुवि
येन नान्यः
कश्चिन्मनो हरित नाथ!भवान्तरेऽपि|21|
स्त्रीणां शतानि शतशो
जनयन्ति पुत्रान्
नान्या सुतं त्वदुपमं
जननी प्रसूता|
सर्वा दिशो दधति भानि
सहस्र-रश्मिं
प्राच्येव दिग्जनयति
स्फुरदंशुजालम्|22|
त्वामामनन्ति मुनयः परमं
पुमांस-
मादित्य-वर्णममलं तमसः
पुरस्तात्|
त्वामेव सम्यगुपलभ्य
जयन्ति मृत्युं
नान्यः शिव: शिवपदस्य
मुनीन्द्र पन्थाः |23|
त्वामव्ययं
विभुमचिन्त्यमसंख्यामाद्यं
ब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनगंकेतुम्|
योगीश्वरं
विदितयोगनेकमेकं
ज्ञानस्वरुपममलं
प्रवदन्ति सन्तः|24|
17. हे मुनीन्द्र! आप न तो कभी
अस्त होते हैं न ही राहु के
द्वारा ग्रसे जाते हैं और न
आपका महान तेज मेघ से
तिरोहित होता है आप एक साथ
तीनों लोकों को शीघ्र ही
प्रकाशित कर देते हैं अतः
आप सूर्य से भी अधिक
महिमावन्त हैं |
18. हमेशा उदित रहने वाला,
मोहरुपी अंधकार को नष्ट
करने वाला जिसे न तो राहु
ग्रस सकता है, न ही मेघ
आच्छादित कर सकते हैं,
अत्यधिक कान्तिमान, जगत को
प्रकाशित करने वाला आपका
मुखकमल रुप अपूर्व
चन्द्रमण्डल शोभित होता है |
19. हे स्वामिन्! जब अंधकार
आपके मुख रुपी चन्द्रमा के
द्वारा नष्ट हो जाता है तो
रात्रि में चन्द्रमा से
एवं दिन में सूर्य से क्या
प्रयोजन? पके हुए धान्य के
खेतों से शोभायमान धरती तल
पर पानी के भार से झुके हुए
मेघों से फिर क्या प्रयोजन |
20. अवकाश को प्राप्त ज्ञान
जिस प्रकार आप में शोभित
होता है वैसा विष्णु महेश
आदि देवों में नहीं |
कान्तिमान मणियों में, तेज
जैसे महत्व को प्राप्त
होता है वैसे किरणों से
व्याप्त भी काँच के टुकड़े
में नहीं होता |
21. हे स्वामिन्| देखे गये
विष्णु महादेव ही मैं
उत्तम मानता हूँ, जिन्हें
देख लेने पर मन आपमें
सन्तोष को प्राप्त करता है|
किन्तु आपको देखने से क्या
लाभ? जिससे कि प्रथ्वी पर
कोई दूसरा देव जन्मान्तर
में भी चित्त को नहीं हर पाता |
22. सैकड़ों स्त्रियाँ
सैकड़ों पुत्रों को जन्म
देती हैं, परन्तु आप जैसे
पुत्र को दूसरी माँ
उत्पन्न नहीं कर सकी|
नक्षत्रों को सभी दिशायें
धारण करती हैं परन्तु
कान्तिमान् किरण समूह से
युक्त सूर्य को पूर्व दिशा
ही जन्म देती हैं |
23. हे मुनीन्द्र! तपस्वीजन
आपको सूर्य की तरह तेजस्वी
निर्मल और मोहान्धकार से
परे रहने वाले परम पुरुष
मानते हैं | वे आपको ही
अच्छी तरह से प्राप्त कर
म्रत्यु को जीतते हैं |
इसके सिवाय मोक्षपद का
दूसरा अच्छा रास्ता नहीं है |
24. सज्जन पुरुष आपको
शाश्वत, विभु, अचिन्त्य,
असंख्य, आद्य, ब्रह्मा,
ईश्वर, अनन्त, अनंगकेतु,
योगीश्वर, विदितयोग, अनेक,
एक ज्ञानस्वरुप और अमल
कहते हैं |
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