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सोऽहं तथापि तव
भक्ति-वशान्मुनीश
कतुं स्तवं विगत-शक्तिरपि
प्रवृत्तः|
प्रीत्यात्मवीर्यमविचार्य
मृगो मृगेन्द्रं
नाभ्येति किं निज-शिशोः
परिपालनार्थम् ||5||
अल्प-श्रुतं श्रुतंवतां
परिहास-धाम
त्वद् भक्तिरेव
मुखरीकुरुते बलान्माम् |
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं
विरौति
तच्चाम्र-चारु-कलिका-निकरैक-हेतुः||6||
त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं
पापं क्षणात्क्षयमुपैति
शरीरभाजाम् |
आक्रान्त-लोकमति-नीलमशेषमाशु
सूर्याशु-भिन्नमिव
शार्वरमन्धकारम् ||7||
मत्वेति नाथ तव संस्तवनं
मयेद-
मारभ्यते तनु-धियापि तव
प्रभावात् |
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु
मुक्ता-फलधुतिमुपैति ननूद-बिन्दुः
||8||
1.झुके हुए भक्त देवो के
मुकुट जड़ित मणियों की
प्रथा को प्रकाशित करने
वाले, पाप रुपी अंधकार के
समुह को नष्ट करने वाले,
कर्मयुग के प्रारम्भ में
संसार समुन्द्र में डूबते
हुए प्राणियों के लिये
आलम्बन भूत जिनेन्द्रदेव
के चरण युगल को मन वचन
कार्य से प्रणाम करके (मैं
मुनि मानतुंग उनकी स्तुति
करुँगा)|
2. सम्पूर्णश्रुतज्ञान से
उत्पन्न हुई बुद्धि की
कुशलता से इन्द्रों के
द्वारा तीन लोक के मन को
हरने वाले, गंभीर
स्तोत्रों के द्वारा
जिनकी स्तुति की गई है उन
आदिनाथ जिनेन्द्र की
निश्चय ही मैं (मानतुंग) भी
स्तुति करुँगा|
3. देवों के द्वारा पूजित
हैं सिंहासन जिनका, ऐसे हे
जिनेन्द्र मैं बुद्धि
रहित होते हुए भी निर्लज्ज
होकर स्तुति करने के लिये
तत्पर हुआ हूँ क्योंकि जल
में स्थित चन्द्रमा के
प्रतिबिम्ब को बालक को
छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य
सहसा पकड़ने की इच्छा
करेगा? अर्थात् कोई नहीं|
4. हे गुणों के भंडार! आपके
चन्द्रमा के समान सुन्दर
गुणों को कहने लिये
ब्रहस्पति के सद्रश भी कौन
पुरुष समर्थ है? अर्थात्
कोई नहीं| अथवा प्रलयकाल की
वायु के द्वारा प्रचण्ड है
मगरमच्छों का समूह जिसमें
ऐसे समुद्र को भुजाओं के
द्वारा तैरने के लिए कौन
समर्थ है अर्थात् कोई नहीं|
5. हे मुनीश! तथापि-शक्ति
रहित होता हुआ भी, मैं-
अल्पज्ञ, भक्तिवश, आपकी
स्तुति करने को तैयार हुआ
हूँ| हरिणि, अपनी शक्ति का
विचार न कर, प्रीतिवश अपने
शिशु की रक्षा के लिये,
क्या सिंह के सामने नहीं
जाती? अर्थात जाती हैं|
6. विद्वानों की हँसी के
पात्र, मुझ अल्पज्ञानी को
आपकी भक्ति ही बोलने को
विवश करती हैं| बसन्त ऋतु
में कोयल जो मधुर शब्द करती
है उसमें निश्चय से आम्र
कलिका ही एक मात्र कारण हैं|
7. आपकी स्तुति से,
प्राणियों के, अनेक जन्मों
में बाँधे गये पाप कर्म
क्षण भर में नष्ट हो जाते
हैं जैसे सम्पूर्ण लोक में
व्याप्त रात्री का अंधकार
सूर्य की किरणों से क्षणभर
में छिन्न भिन्न हो जाता है|
8. हे स्वामिन्! ऐसा मानकर
मुझ मन्दबुद्धि के द्वारा
भी आपका यह स्तवन प्रारम्भ
किया जाता है, जो आपके प्रभाव से सज्जनों के
चित्त को हरेगा| निश्चय से
पानी की बूँद कमलिनी के
पत्तों पर मोती के समान
शोभा को प्राप्त करती हैं|
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Shri Digamber Jaincharya 108 Muni Mantunga
Acharya
Manatunga
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